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Showing posts from 2020

नाकामियाब जिंदगी....!

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नजाने कितने ख्वाब देखें थे जिंदगी से, सब टुटतेहि चले जा रहें है। जहा की हर एक कामियाबी से, सब रिश्ते रूठतेही चले जा रहें है। पता नही मंजिल कब हाँसिल होगी, पता नही इस शाम की सुबह कब लौट आयेगी, इस अंधेरे में दर बदर ठोकरे खाने से, जवां होकर भी पैर थकतेहि जा रहें है। रूठें भी तो किस्से रूठे??! दोशी ठहराए भी तो किसे ठहराए??! इस वक्त ने ही जनाज़ा निकाला है हमारा इस जमाने से, वरना हर एक मुश्किल से तो बचपन से ही लड़ते आ रहें है। आज ये वक्त आ गया, के उस खुदासे भी नफरत होने लगी, शिकवा है इस खुदा से,  के कहा गयी मेरी हसीन जिंदगी????!, लौटा देना जरूर उसे भरकर कामियाबी से, वरना इस जिंदा जिस्म से, जान निकली जा रहीं है।                               -- ग. सु. डोंगरे  

जहाँ के रंग, कूछ ऐसे भी......!

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पुरा जहाँ तकलीफ में है। और खुदा भी मेहेफुज नहीं है। आज वक्त ने ऐसी बाजी पलट ली,  की अपने भी अपनों से मूह फेर रहे है। जहां कंधे से कंधा मिलाकर काम चलता था, वहां हातमें हात मिलानेसे भी डर रहे है। सबकों बांध लिया है कुदरत नें अपनी जंजीरोसे, किसींको खाणे के लिये अन्न नहीं, तो किसको प्यास बुझानेके लीये पाणी नहीं है। कुछ चिजे खरीद कर जिंदगी मजे से जी रहें थे हम, जिंदगी जीने के लीये कभी सोचा ही न था,  के चार दिवारों के अंदर का सुना पन भी मिटाना जरुरी होता है।  जिंदगी भर पैसो के पिछे भाग भाग कर थक गये लोग, आज ना वो रुपया काम आ राहा,  और ना ही ऊस रुपये से खुशीया खरेदी जा रही है। ना  काम आयी कोई दुआ, और ना ही कोई मंदीर, मस्जित हो या चर्च, आज लाखों की जिंदगी बच रही क्योकी, डॉक्टर, नर्स, पुलीस भगवान बनकर लड रहे है।                                          - ग. सु. डोंगरे

बस फुरसत ही फुरसत...!

फुरसत....! कितना अजीब लब्ज है ये फुरसत, आजके जमाने में किसीको वो मिलता नाही, पर कभी कभी ऐसे भी दिन आतें है, तब हमे फुरसत से निकलना पड़ता है, तो कभी फुरसत ही फुरसत होती है। ऐसा ही फ़ुरस...

कोरोना...!

'आयुष्यातली एक स्वप्नागत हकिगत'. काही दिवसांपूर्वी चायना मधून एका नवीन रोगाचा उदय झाला त्याला उद्रेकही म्हणता येईल, त्याचे नाव 'कोरोना'. ही बातमी कानावर आल्यानंतर अगदी सह...

आई चे अश्रु....!

        (मुंबई मधे एक वर्ष काम करून परत घरी जाऊन मुंबई ला परत येण्याचा योग)           मुंबई सोडल्यानंतर जवळपास नऊ महीने घरिच होतो, त्यात नेट चा अभ्यास तर एम फिल च्या प्रवेश पर...

दोस्ती के रंग कुछ ऐसे भी....!?

पता नही क्यो? पर सब अपना-अपना देखते है। बाकी कुछ भी हो, सब अपना ही सोंचते है। (शायद मुझे भी ऐसा ही जीना चाहिए।) हम किसी को कितना भी अच्छा दोस्त क्यो न माने, वो तो अपनी रंग से ही जीते...

मुक्तांगनी मी धन्य झालो...!

मुक्तांगणी मी धन्य झालो...! ना मला कळले कधी व्यसना मधी मी डूंबलो, एक प्याला त्या विशाचा नकळत मी प्यायलो...! ना कधी चिंता मनाची, ना कुणाची ओढ़ झाली, फक्त स्वार्थावाचुनिया माझ्या, घ...